Sunday, 5 April 2015

ऐ धूप के साथी...मंज़र तो परख 
जो मज़ा साथ जलने में था.. वो अकेले भीगने मे कहाँ 
मिलती हैं हंसकर मुझसे अब अदाएँ मेरी...
तू रूठा अब कहाँ ये मान पाएँगी
रंज-ओ-गम नहीं...यकीन साथ रखते हैं..
मयस्सर जो हो साथ तेरा, फिर से मेरी हो जाएँगी

Tuesday, 17 February 2015

बेतकल्लुफ़

आँखमिचौली खेलेँ जब जब तेरी अँखियां मुझसे

 एक हल्की मस्त बयार सी शोख़ी जगती मन मेँ

शरारत का तकाज़ा कहता ताल मिला लेँ

 वल्लाह तेरी गुस्ताख़ अँखियाँ ......

मन मेँ गढते चाल चुरा लेँ


आधा पौना ही अभी दिल था संभला...

तभी तेरी अँखियोँ का बेतकल्लुफ़ न्योता...

चल अब हाल मिला लेँ