Sunday, 5 April 2015

ऐ धूप के साथी...मंज़र तो परख 
जो मज़ा साथ जलने में था.. वो अकेले भीगने मे कहाँ 
मिलती हैं हंसकर मुझसे अब अदाएँ मेरी...
तू रूठा अब कहाँ ये मान पाएँगी
रंज-ओ-गम नहीं...यकीन साथ रखते हैं..
मयस्सर जो हो साथ तेरा, फिर से मेरी हो जाएँगी

Tuesday, 17 February 2015

बेतकल्लुफ़

आँखमिचौली खेलेँ जब जब तेरी अँखियां मुझसे

 एक हल्की मस्त बयार सी शोख़ी जगती मन मेँ

शरारत का तकाज़ा कहता ताल मिला लेँ

 वल्लाह तेरी गुस्ताख़ अँखियाँ ......

मन मेँ गढते चाल चुरा लेँ


आधा पौना ही अभी दिल था संभला...

तभी तेरी अँखियोँ का बेतकल्लुफ़ न्योता...

चल अब हाल मिला लेँ

Tuesday, 25 March 2014

to be continued....

ना आरजू थी मेरी तुझसे मिलने से बड़ी कोई

तेरे पास होकर ख्वाहिशों का बढ़ता दायरा अच्छा लगा !!!

Tuesday, 17 September 2013

बेपरवाह....

न जाने कब, कैसे ..

पर तुम जो शामिल हुए ....अच्छा लगा !

यूँ तो कट ही रही है हसीन ख्वाबों में ज़िन्दगी ...

दो पल उन ख्वाबों को जी लेना ....अच्छा लगा !!

Thursday, 23 May 2013

मनः स्थिति

उलझे  नब्ज़  के  सुलझे  आधार  हैं ...
मझधार में नैया है टूटे पतवार हैं ...

Tuesday, 7 May 2013

...........आखिर तू क्यूँ इतना दूर है (in love with moon ;) )

छाया मुझपे तेरा ही सुरूर है
ए चाँद तू  आखिर क्यूँ इतना दूर है ...

मयंक, मृगांक , महताब के नाम से तू मशहूर है
यूँ  आके  तेरा चला जाना मुझे नामंजूर है ...

ए चाँद तेरी चांदनी ही तेरा गुरूर है
लगता है जैसे तू कोहिनूर है ...

तेरे साथ होने की ख़ुशी तो है…. पर साथ गम  भी जरूर है
...........आखिर तू  क्यूँ इतना दूर है